हे चमत्कारी आत्मा,
चलिए शुरू करते है आज का कॉस्मिक मेल हमारे अलौकिक पिता ब्रम्हांड का शुक्रिया करते हुए।

सवाल: परमात्मा का स्वरुप कैसा होता है? किस मूरत का ध्यान करें?

अलौकिक पिता परमात्मा का जवाब:

“मेरे प्यारे बच्चो,
मैं आपका अलौकिक पिता परमात्मा हूं। मैं हमेंशा चाहता हूं की मेरे बच्चे बहोत खुश रहे। बात आयी है मेरे स्वरुप की तो मैं बता देता हूं मेरे बच्चो को की मैं बिलकुल आप जैसा नहीं हूं। मेरा आप जैसे नहीं होने का मतलब की मैं आपके शरीर जैसा नहीं हूं। मैं किसीके भी शरीर जैसा नहीं हूं। हकीकत मैं मेरे पास शरीर ही नहीं है लेकिन हाँ मैं तुम्हारी आत्मा जैसा जरूर हूं।

अब आत्मा का स्वरुप तो क्या ही बताऊ मैं अपने बच्चो को! आत्मा परमात्मा यानी की मुझसे से निकला हुआ एक कण है। आत्मा निराकार है। आत्मा ना कभी मरती है ना ही कभी जन्म लेती है। आत्मा को ना देखा जा सकता है नहीं अनदेखा किया जा सकता है। आत्मा अमर है क्यूंकि वह मेरा अंश है।

अगर मेरे बच्चो को ध्यान करना है तो स्वरुप या मूरत की क्या ज़रूरत है? ऐसी चीज का ध्यान ही क्यों करना है जिसका अंत तेय है। इस लिए मेरे स्वरुप और मूरत के बारे मे ना सोचे। आत्मा और परमात्मा बिंदु स्वरुप निराकार है। ध्यान को बस वह बिंदु पे केंद्रित करें। आत्मज्ञान की बरसात अपने आप बरसने लगेगी।”