हे मंगलकारी आत्मा,
चलिए शुरू करते है आज का कॉस्मिक मेल हमारे अलौकिक पिता ब्रम्हांड का शुक्रिया करते हुए।

सवाल: अगर मोह माया मे नहीं पड़ना चाहिए तो यह बनाया ही क्यों?

अलौकिक पिता परमात्मा का जवाब:

“मेरे प्यारे बच्चो,
मैं आपका अलौकिक पिता परमात्मा हूं। मैं हमेंशा चाहता हूं की मेरे बच्चे बहोत खुश रहे। चलिए बड़ी आसानी से इस जवाब को समझते है।

मैंने भावनाये बनायीं है जिसका आप अनुभव करते हो। और यह किस से कहा मेरे बच्चो ने की मोह माया मे नहीं पड़ना चाहिए? अवश्य पड़ना चाहिए लेकिन भौतिक और लौकिक मोह माया नहीं पर अलौकिक मोह माया मे पढ़िए। आत्मज्ञान का मोह रखिये और मोक्ष की माया मे विलीन हो जाइये। जो भी चीज़े मैंने बनायी है उसका अवश्य ही कोई अर्थ और उपयोग है लेकिन मेरे बच्चे इस्तेमाल अलग जगह करते है और इसी लिए कही ना कही सुना होगा की मोह माया विचलित करती है।

एक बहोत छोटा सा उदाहरण है। पानी आपको जीवनदान प्रदान भी कर सकता है और पानी आपको अपने अंदर डूबा के मृत्यु भी प्रदान कर सकता है। तो क्या पानी नहीं बनाना चाहिए था मुझे? फिर कैसे जी पति यह सृष्टि? सवाल मैंने बनायीं हुई चीज़ो का नहीं है, सवाल उन चीज़ो के सच्चे इस्तेमाल का है, सवाल आपकी सोच प्रणाली का है। यह तो वैसी बात है जो आप लोगो ने बहोत सुनी होंगी; किसीको शिवलिंग मे भी पथ्थर दीखता है और किसीको पथ्थर मे भी शिवलिंग। सोच को बदलने की ज़रूरत है, मेरे बच्चो।”