हे चमत्कारी आत्मा,
चलिए शुरू करते है आज का कॉस्मिक मेल हमारे अलौकिक पिता ब्रम्हांड का शुक्रिया करते हुए।

सवाल: क्या आत्मज्ञान के लिए संसार का त्याग जरुरी है?

अलौकिक पिता परमात्मा का जवाब:

“मेरे प्यारे बच्चो,
मैं आपका अलौकिक पिता परमात्मा हूं। मैं हमेंशा चाहता हूं की मेरे बच्चे बहोत खुश रहे। इस सवाल का जवाब भी आसान है।

संसार! क्या होता है ये संसार? क्या असल व्याख्या है इस संसार की? ज़्यादातर लोग ये मानते है की संसार मतलब यानि संबंध। संबंध चाहे दोस्ती का हो, प्यार का हो, पति पत्नी का हो, माँ बाप का हो, बेटे बेटी का हो वगेरा। लेकिन क्या इसे संसार कहते है असल मे? जी नहीं। संसार का असली मतलब होता है फेरा। जन्म मृत्यु का फेरा।

अगर इस जन्म मे आपको अपने सारे काम करते हुए, सारे संबंध निभाते हुए भी आत्मज्ञान हो जाता है तो यह आपका आख़री जन्म है और आपने संसार त्याग दिया है लेकिन इसका मतलब ये बिलकुल नहीं है की इस जन्म मे आप अपने सारे काम छोड़ दोगे और सारे संबंध तोड़ दोगे। आप सारी चीज़े करते हुए भी संसार छोड़ सकते है।

बहोत आसान और सीधा सा जवाब है इस सवाल का की अगर यह आपका आख़री जन्म है तो समजलो आपने संसार त्याग दिया है।”