हे चमत्कारी आत्मा,
चलिए शुरू करते है आज का कॉस्मिक मेल हमारे अलौकिक पिता ब्रम्हांड का शुक्रिया करते हुए।

सवाल: सांसारिक जीवन मे धर्म क्या होता है?

अलौकिक पिता परमात्मा का जवाब:

“मेरे प्यारे बच्चो,
मैं आपका अलौकिक पिता परमात्मा हूं। मैं हमेंशा चाहता हूं की मेरे बच्चे बहोत खुश रहे। लोगो दो नज़रिये से देखते है धर्म को। आईये समझते है।

धर्म को वैसे दो तरीके से देखा जाता है। एक होता है अलग अलग साम्प्रदाय का धर्म और दूसरा होता है असल धर्म। हम हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि धर्म के बारे मे बात नहीं करेंगे। हम यहाँ असल धर्म की बात करेंगे।

हमारा वास्तविक सांसारिक धर्म क्या है? धर्म का अर्थ होता है सत्य। जहा सत्य है वहा धर्म है और जहा धर्म है वही सत्य है। लेकिन आज कल सत्य का प्रयोग बहोत ही कम हो रहा है। छल, कपट और असत्य से अधर्म की शुरुआत होने लगी है। आप सब सोच रहे होंगे की सत् प्रतिशत सत्य का प्रयोग तो कैसे मुमकिन है? और मैं ये कहता हूं की सत् प्रतिशत सत्य का प्रयोग सबसे आसान है।

आज कल लोग सत्य बोलते नहीं है क्यूंकि लोग सत्य हजम नहीं कर पाते है। तो क्या हमें सत्य बोलना बंध कर देना चाहिए? नहीं। सबसे पहला काम जो हमें करना चाहिए वो ये है की हमें सत्य सुनना और उसे हज़म करना सिख लेना चाहिए और फिर सत्य का प्रयोग शुरू करना चाहिए।

सत्य का मार्ग कड़वा और कठिन जरूर होगा क्यूंकि सत्य के प्रयोग की प्रथा लुप्त हो चुकी है. लेकिन अगर अंत का मुआयना करें तो जीत सत्य की ही होंगी इस बात को कभी ना भूले। ये मेरा वादा है आपको। मैं सत्य के साथ हर सुख दुःख मे खड़ा रहता हूं।

तो धर्म ही सत्य है और सत्य ही धर्म है। अब साम्प्रदायिक धर्मो को उठाके देखलो, सारे के सारे सत्य पर टिके हुवे है। इसी लिए उसका नाम धर्म रखा गया है।”