हे सफल आत्मा,
चलिए शुक्रिया करते है हमारे अलौकिक पिता ब्रम्हांड का और फिर शुरू करते है आजके कॉस्मिक मेल को।

अगर हमारे अलौकिक पिता एक ही है तो फिर आपने इतने सारे धर्म क्यों बनाये?

इस सवाल पे हमारे अलौकिक पिता ब्रम्हांड हमसे कुछ कहना चाहते है:

मेरे प्यारे बच्चो,
मैं आपका अलौकिक पिता ब्रम्हांड हूं। आप सभी मेरे कण है। मैं आपका अलौकिक पिता होने के नाते मेरे सारे बच्चो को बेहद खुश और सफल देखना चाहता हूं। बहोत इस प्यारा सवाल किया गया है आज।

मैं ब्रम्हांड हूं। सब कुछ मेरे अंदर समाया हुआ है। मैंने सिर्फ सृष्टि की रचना की। सारे जीव इत्यादि की रचना की जिसका मेरे बच्चे भी एक हिस्सा है। जैसे मैंने कुत्ते बिल्ली और बाकि जीव को बनाया वैसे ही मैंने मनुष्य को बनाया। मनुष्य को कुछ विशेषताएं दी गई है लेकिन मनुष्य ने उसका दूर उपयोग किया। क्या कभी सुना है की ये कुत्ता हिन्दू है या ये कुत्ता मुश्ल्मान? वे तो आपके जितने समझदार है भी नहीं। फिर क्या फायदा हुआ मनुष्य को विशेषताएं देने का?

धर्म क्या है? जब मनुष्य को अपने आप पे भरोसा नहीं होता है या जब तक वह अपनी शक्तियों को नहीं जनता है और किसीका सहारा चाहता है तब होती है धर्म की शुरुआत। क्यों मेरे बच्चे निर्बल हो रहे है? क्या माँ की कोख से आप धर्म को लेके आते हो? नहीं। धर्म की स्थापना आपने की।

जब कोई मायावी आत्मा व्यक्ति के रूप मे जन्म लेती है और आपको जीवन उपदेश देती है तो आप उस उपदेश से ज़्यादा और व्यक्ति से जुड़ जाते है और उसके नाम का एक धर्म बना लेते हो। फिर और व्यक्ति जुड़ते जाते है उस धर्म मे और ये बड़ा होता जाता है। असल मे उपदेश को बहोत ही काम लोग जीवन मे उतारते है। ऐसे ही बने है धर्म।

मेरे बच्चो, मैंने धर्म नहीं बनाया है। आपके भय और निर्बलता ने धर्म को जन्म दिया है।”